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मदिरा छलकाने आई

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'225
मदिरा छलकाने आई
दिल से बतियाने आई
चूड़ी कंगन खनक उठे
जब वो सिरहाने आई
शांत हुई मिलकर मुझसे
मुझको समझाने आई
भटक रही है सदियों से
मुझमें खो जाने आई
खुशबू है वह फूल नहीं
ख़ुद को बिखराने आई
नाम पता खो जायेगा
दर्पण दिखलाने आई
नंदी शिव के सम्मुख हैं
गौरी समझाने आई