#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'204
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
फ़िक्र मेरी ले के शुहरत पा रहा है
मेरी ग़ज़लें बज़्म में वह ग़ा रहा है
'मीर' 'ग़ालिब' हम - तसव्वुर लग रहे हैं
वो तरन्नुम पर बदन लचका रहा है
शीरीं उर्दू से रची है उसकी ख़ुशबू
वह क़रीने से ग़ज़ल समझा रहा है
हादिसों की जर्बे-पैहम सोचती हैं
क्यों न उनसे दिल संभाला जा रहा है
अब फ़िज़ाओं में कहाँ वह बात है जो
इन घटाओं का बदन लहरा रहा है
लग्ज़िशों की बारिशें थमने पे आईं
बांहों का छाता निकाला जा रहा है
जब 'कँवल' मुहलत सज़ाओं ने उसे दी
वह ख़ताओं के अलम लहरा रहा है