#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'142
ज़ुल्फ़ गालों पे बिखरने को ग़ज़ल कहते हैं
यार के सजने संवरने को ग़ज़ल कहते हैं
मत्ला है वह जो इशारों में बड़ी बात कहे
दिल की गलियों से गुज़रने को ग़ज़ल कहते हैं
शेर वह इत्र-ए-नसीहत की हो ख़ुशबू जिसमें
ख़ुद ब ख़ुद अपने सुधरने को ग़ज़ल कहते हैं
उसके बन्दों से मुहब्बत को तरन्नुम कहिये
याद अल्लाह की करने को ग़ज़ल कहते हैं
ख़ुद जिए औरों को जीने दे वही मक़ता है
रंग में भंग न करने को ग़ज़ल कहते हैं
बेसबब बातों ही बातों में हसीं चेहरों के
डूबने और उभरने को ग़ज़ल कहते हैं
अपने आपे में रहो ख़ुशियों के तूफ़ाँ में कँवल
आंच में ग़म की निखरने को ग़ज़ल कहते हैं
सृजन : 31 अक्टूबर 2014
दूरदर्शन के 19 नवम्बर 2014 के आईना कार्यक्रम में प्रसारित
रोज़नामा अल हयात,रांची के 25 अक्टूबर, 2018 में प्रकाशित
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