#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'136
ज़रा ज़रा सी बात पर वो मुझसे बदगुमां रहे
जो रात दिन थे मेहरबां, वो अब न मेहरबां रहे
जुदाइयों की लज्ज़तों की वुसअतें नहीं रहीं
वो ख़ुश ख़याल-ए-वस्ल बन के मेरे दरमियाँ रहे
पहेलियाँ बुझाओ मत,बहाने अब बनाओ मत
यहीं कहीं नहीं थे तुम,बताओ फिर कहाँ रहे
वो मेरे साथ कब न थे,गिला करूँ जो मैं भला
ज़रा ज़रा सी बात का फ़िज़ूल क्यों बयां रहे
न झील कोई शहर में ,तलैय्या ताल भी नहीं
ये लश्कर-ए-परिन्द फिर बताइये कहाँ रहे
मुहब्बतें,मुरव्वतें,लिहाज़ या ख़ुलूस हो
सभी हैं दर ब दर कि अब न इनके क़द्रदां रहे
मसर्रतों की धूम उनके फ्लैट में है रात दिन
हमारे ग़म की बस्तियों में कर्ब-ए-जाविदाँ रहे
ज़रा ज़रा सी बात पर बिछड़ गए जो बेसबब
अना ओ ज़िद की कश्मकश में हम यहां वहां रहे
ये आसमां की तीरगी, नुमाइशों की रौशनी
‘कँवल’ तुम्हारी राह में हमेशा कहकशां रहे
सृजन : 8 नवम्बर,2014