#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'137
ज़रुरियात की फ़ेहरिस्त वह दिखाता है
फिर इक इशारे पे बांहों में झूल जाता है
हमेशा वादों की छावों में मुस्कुराता है
कभी कभार भी वादा नहीं निभाता है
सुना के लोरियां रातों में माँ सुलाती है
सवेरे ‘पढने को जाओ’, पिता जगाता है
मैं उसके होंटों की पाकीज़गी का कायल हूँ
कलाम-ए-पाक सुनाये, भजन जो गाता है
सफ़र पे निकलूं तो कहती है माँ ‘ख़ुदा हाफ़िज़’
सलामती का ये नुस्ख़ा ही काम आता है
लगाई आग तो पहले छुपा के मुंह लेकिन
अब आगे आगे वही आग भी बुझाता है
ग़रीब लोग ज़रूरत पे अपनी रोते हैं
अमीर लोगों को धन बेसबब रुलाता है
जो ऐश करते है रातों में उन शरीफ़ों को
सवेरे फूल सा चेहरा कहाँ लुभाता है
कभी तो आ के ‘कँवल’ बैठ रूबरू मेरे
ये फेसबुक पे अबस वक़्त क्यों गंवाता है
सृजन 16 जून 2013 (फ़ादर्स डे)
प्रकाशन : अवामी न्यूज़ रांची 26 अक्टूबर,2018 ; पृष्ठ 3
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