#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'082
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
ख़ुशनुमा लमहों के पंछी छत बदलते ही रहे
ग़मज़दा मौसम मेरे हमराह चलते ही रहे
माज़ी के सावन ! सुहाने घन ! मचलते ही रहे
याद की छतरी लिए हम तुम टहलते ही रहे
शक की गुंजाइश बनी जब से हमारे दरमियाँ
मुट्ठियों की रेत सी हम तुम फिसलते ही रहे
आप तो मनका के धागे थे, अलग जब से हुए
मोती मेरी ज़ीस्त के पग पग निकलते ही रहे
बादलों की मेहरबानी धूप पर होती रही
मंज़रे-दिलकश से जग वाले बहलते ही रहे
यकबयक मंज़िल बढ़ी क़दमों में अपने आ पड़ी
हम तो नक्शे-राह पर बेख़ौफ़ चलते ही रहे
जिस को जो भी चाहिए सूरज ये देता है 'कँवल'
धूप गर्मी रौशनी लू आग फलते ही रहे