#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'081
ख़ुदा के दर पे मैं अपनी इबादतें रख दूँ
तुम्हारे माथे पे ख़ुशियों की आयतें रख दूँ
बदन नवाज़ बदन की शराफ़तें रख दूँ
मैं शब की बाहों में दिन की इमारतें रख दूँ
शरीफ़ लोगों की बचकाना हरकतें रख दूँ
ग़रीब लोगों की बस्ती में आफ़तें रख दूँ
तुम्हारी झील सी आँखों की गर इजाज़त हो
तुम्हारे होंटों पे अपनी मुहब्बतें रख दूँ
तुम्हारे जूड़े में ताज़ा गुलाब सजता रहे
तुम्हारी साँसों में ख़ुशबू की वुसअतें रख दूँ
बग़ैर झूट के घर बार चल नहीं सकता
करीब आओ मैं सच की नज़ाकतें रख दूँ
बदन पे तैरते सावन की वह इबारत है
ये दिल की ज़िद कि मैं उस पर वसीअतें रख दूँ
तेरे बग़ैर तो लगता था जी न पाऊंगा
तेरे बग़ैर भी ज़िन्दा हूँ,अज़मतें रख दूँ
‘कँवल’ मैं ‘अन्ना’ के हमराह चल भी सकता हूँ
अगर कहीं पे ये घर की ज़रूरतें रख दूँ
सृजन : 10 अप्रैल 2013
आकाशवाणी,पटना से 14 जुलाई 2014 को प्रसारित
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