#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'080
ख़त्म बेटों का फ़ोन आना हुआ
बेटियों से मिले ज़माना हुआ
याद के फूल सूखते ही नहीं
उनसे बिछुड़े हुए ज़माना हुआ
मतलबी सब हैं अपने मतलब के
मुफ़्त कब किसका मुस्कुराना हुआ
ज़िन्दगी में मेरे न कुछ बदला
बेसबब उनका आना जाना हुआ
गुनगुनाने लगा उन्हें पाकर
दिल का मौसम भी आशिक़ाना हुआ
दबदबा मुजरिमों का कब्ल से था
अब तो अंदाज़ क़ातिलाना हुआ
उसने छलकाए जाम आँखों से
मैं गिरफ्तार जा के थाना हुआ
तितलियाँ साइकिल पे उड़ती हैं
बेटियों का सफ़र सुहाना हुआ
पायलों की छनक है घर आँगन
बन के बेटी बहू का आना हुआ
मरहबा मरहबा रमेश कँवल
बेटियों को सफल पढ़ाना हुआ
सृजन 11 नवम्बर 2017
दैनिक हिंदुस्तान,पटनानामा 13 दिसम्बर 2017 में प्रकाशित
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