#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'074
फ़ाइलुन मफ़ाईलुन फ़ाइलुन मफ़ाईलुन
क़ाफ़ियों के पहरे में शे'रियत बरसती है
आम बात कहने से ख़ासियत झलकती है
रूह के तफ़क्कुर से उन्सियत टपकती है
जिस्म की नुमाइश पर जिन्सियत मचलती है
अपने मुंह मियां मिट्ठू क्यों बने कोई कहिये
बेज़ुबान लोगों की हैसियत चमकती है
जाल की हवसगर्दी से नजात पाने में
झील में मछलियों की शख्सियत संवरती है
रात दिन पहाड़ों पर बारिशों की आफ़त से
शहर, गाँव, बस्ती में खैरियत उलझती है
हौसले की दुल्हन से जो वफ़ा निभाते हैं
ऐसे लोगों की जग में अहमियत उभरती है
है ख़ुशी 'कँवल' को अब ज़िन्दगी की शहजादी
डगमगाती है, फिर भी आफ़ियत सँभलती है