#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’311
है मुहब्बत जो तेरे दिल में वही इस दिल में है
चाशनी आवाज़-ए-दिल की नग़मा-ए-महफ़िल में है
तुम अदब से सर झुकाओ,पेश अपना दिल करो
देखो क्या अज़्म-ए-जवां,क्या बांकपन क़ातिल में है
इस सुनहरी धूप की गुस्ताखियां तो देखिये
सीम तन ज़ोहरा जबीं क्यों कश्ती-ए-साहिल में है
कुछ न कुछ नायाब तोहफ़े देते रहिये ज़ीस्त को
कौन कहता है शुमार अपना किसी बुज़दिल में है
हुस्न की रानाइयां जलवानुमा हैं नेट पर
इस मुहज्ज़ब दौर की तहसील इस हासिल में है
सीम ओ ज़र आसाइश-ए-अहल-ए-हुनर का है नसीब
कायनात अपनी फ़क़त इक काशा-ए-साइल में है
मील के पत्थर की ख़ुशबू से बढ़ो आगे ‘कँवल’
नश्शा-ए-फ़िक्र-ए-अमल तो दूर की मंजिल में है
सृजन : 31अगस्त,2015
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