#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’304
मफ़ऊलु फ़ाइलातु मफ़ाईलु फ़ाइलुन
हर शह्र गाँव क़स्बे पे यूँ मेहरबां हुआशुहरत का तू ही राहे- रवां, कारवां हुआ
आवाज़ की बुलंदियां बस तेरे नाम थीं दोनों जहां में कोई भी तुझसा कहां हुआ
यकजा हुए लता में यूँ सुर ताल और लय
ठुमरी,ग़ज़ल,भजन का हसीं गुलसितां हुआ
कमबख़्त बेसुरी नहीं होती कभी भी ये
बिस्मिल्ला का ये फ़िकरा हक़ीक़त बयां हुआ
हुब्बुल वतन का तज़्किरा था मेरे नाम ही सारे जहाँ की नज़रों में मैं दास्ताँ हुआ
तेरी तलाश ने मुझे भटकाया यूँ 'कँवल'
हर इक पड़ाव मुझ को तेरा आस्तां हुआ