#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’302
हर दम दिल के आंगन मे ली गम ने ही अंगड़ाई
भूले से भी गूंज सकी न खुशियों की शहनाई
रंग रंगीले दुनिया वालों की उफ़ रे नादानी
बनते है सब मन के बदले तन के ही शैदाई
हुस्न को पूजा, चाहा , सराहा, हर दम इस दुनिया ने
किस युग मे इस इश्क को जग ने सूली नहीं चढ़ाई
तन के काले बंदे नंगे फुट पाथों पर सोये
मन के काले लोगों को गददों पर नींद न आई
खुशियों के हंगामे तो चलते ही थक जाते है