#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’299
हम ख़ाकनशीनों को अब आराम नहीं है
पर शहर के हाकिम को ये इल्हाम नहीं है
ये इश्क़ का ग़म ,गर्दिशे-अय्याम नहीं है
सब जानते हैं इसको ये गुमनाम नहीं है
वहशत है निगाहों में हवस दिल में है बरपा
राधा नहीं, मीरा नहीं, घनश्याम नहीं है
वैसे तो तेरी यादों की खुशबू भी है लेकिन
जो साथ तेरे गुज़री थी वह शाम नहीं है
जो नोट चलन से हुए बाहर, हैं वो ग़मगीं
क्यों आम घरों में कोई कुहराम नहीं है
जो ताजिरे-दहशत हैं ,जो हैं अहले-सियासत
मातम में हैं डूबे हुए कुछ काम नहीं है
नीतीश का सूबा है ‘कँवल’, हैं सभी वाक़िफ़
सागर में मेरे बादा-ए गुलफ़ाम नहीं है
सृजन : 11 नवम्बर 2016