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साहिबा को सलाम है साहिब

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’293
हर जगह उनका नाम है साहिब
साहिबा को सलाम है साहिब
मस्त आँखों का जाम है साहिब
मयकदा अब हराम है साहिब
जब से रब का है नाम होंठों पर
ग़म का क़िस्सा तमाम है साहिब
चन्द साँसें खरीद भी न सके
धन का ऐसा निज़ाम है साहिब
बादशाहत है चाँद तारों की
रात तो बस ग़ुलाम है साहिब
क्यों मैं इज़्ज़तमआब से मिलता
हसरतों पर लग़ाम है साहिब
अब कहाँ हम गले लगाते हैं
दूर से ही सलाम है साहिब
सब्ज़ियों में है ज़ह्र की रंगत
ताज़ा फल भी हराम है साहिब
उनकी चाहत का जश्न ख़त्म हुआ
शामे-ग़म का पयाम है साहिब