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सामने तुम हो, सामने हम है, बीच में शीशे की दीवार

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’291
सामने तुम हो, सामने हम है, बीच में शीशे की दीवार
रंगे-व फ़ा झलके आंखों में, लेकिन हो कैसे इज़हार
गूंगा सा मै, तुम भी चुप चुप, दिल में है तू फ़ान बपा कोई ये खामोशी तोड़े, चुप हो जायेगा संसार
दम लेने को छांव़ में उल्फ़त की जब इक पल ठहर गया छोड़ चले सब साथी मेरे, उनको जह़र लगा ये प्यार
हुस्न की मांग में चांद सितारे रक्सकुनां1 है शामो-सहर2 लेकिन मेरा इश्क़ अभी तक पहने है कांटो का हार
सावन के बादल भी अपना रूप दिखाकर जाते है रक्सकुनां शोलों के संग मे झूमती है जब कभी बयार
जे़रे-फ़लक3 रह कर भी अपनी आंख लगी थी सू-ए फ़लक4 आखिरकार महो-अख़्तर5 से हम भी पत्थर हो गये यार
मेरी जब बारी आई तो रूठ गया मुझसे अल्लाह
आह! 'कंवल ने तो मांगा था तुमसे बस सावन का प्यार