#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’289
सहमी सहमी हुई तस्वीर लिये बैठे हैं
आइने खौफ़ की जागीर लिये बैठे हैं
हसरते-जु़ल्फ़े-गिरहगीर लिये बैठे हैं
नुक़्रई1 यादों की जंजी़र लिये बैठे हैं
गर्दिशों का है मुकद्दर पे कड़ा पहरा मगर
हर क़दम पर नई तदबीर2 लिये बैठे है
अपने हर ख़्वाब की ताबीर3 ख़लिश है लोगो
अपने हर ख़्वाब की ताबीर लिये बैठे हैं
तुम वहां बैठे हो क्यों मिलने का वादा करके
हम यहां ख़ुशियों की तनवीर4 लिये बैठे है
अब भी आती है हर इक ख़त वफ़ा की खुशबू
हम तेरी शोख़ी-ए-तहरीर5 लिये बैठे हैं
हमने भी रक्खा है इक ताजमहल कमरे में हम भी एक जज़्ब-ए-तामीर6 लिये बैठे हैं
वस्ले-महबूब7 की बात उठी तो याद आया 'कंवल
हम तो फूटी हुई तक़दीर लिये बैठे हैं