#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’286
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल
समुन्दर में बेचैन हैं मछलियाँ
गिराए हुए जाल हैं किश्तियाँ
'पढ़ाई लिखाई का मौसम कहाँ’चली आईं बुर्के में सब बच्चियाँ
चलाता है चप्पू कहाँ नाख़ुदा
पसोपेश में रेत पर बस्तियाँ इशारा हवा का हुआ जिस घड़ी नशेमन पे गिरने लगीं बिजलियाँ ज़मीं पर था अदना सा चेहरा जिसेकोई चाँद कहता, कोई कहकशांकई मदरसे साज़िशों में फंसे यहां इल्मो-फ़न की उड़ी धज्जियाँ ‘कँवल' हुकमरां जब से बदले मेरे सियासत बदलने लगी नीतियाँ