#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’283
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
शह्र से लाज का अपहरण हो गया
गाँव में अस्मिता का क्षरण हो गया
उनके दफ़्तर में सूरज रहा क़ैद जब
कालिमा का घरों में वरण हो गया
भाईचारे पे हिम खंड जमते रहे
भाई का शत्रु - सा आचरण हो गया
लड़कियां रस्सियों पर सँभलती रहीं
साँस थमने का वातावरण हो गया
कोट टाई में जब आदिवासी मिले
गाँव की सभ्यता का मरण हो गया
क्या हुआ कार से लोग कुचले गए
धन मिला, दुख का नकदीकरण हो गया
सर से गठरी जो फेंकी अपेक्षाओं की
मेरे दुख का 'कँवल' आहरण हो गया
15 अक्टूबर, 2021