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वो रह - रह के अब याद आने लगे हैं

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’277
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
वो रह - रह के अब याद आने लगे हैं'जिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं'
मेरी कामयाबी ज़रूरत है जिनकी वो राहों से पत्थर हटाने लगे हैं उन्हें पड़ गया है कोई काम शायद मुझे दोस्त कह कर बुलाने लगे हैंअदालत से है अब नहीं ख़ौफ़ कोईसड़क पर ही जज मारे जाने लगे हैं मेरी सोच का क़ाफ़िला सोचता है ये एहसास क्यूँ कुलबुलाने लगे हैं तलब है जिन्हें आज शीरीं ज़ुबां की वो उर्दू को दिल से लगाने लगे हैं
गिरफ़्तार ग़ज़लों की ख़ुशबू में हैं जो
वो अब नागरी आज़माने लगे हैं 'कँवल' आरज़ू के झमेले में पड़ कर 'तमन्ना की महफ़िल सजाने लगे हैं