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वो जो घर था, तुम से ही था वो घर, तुम्हें याद हो कि न याद हो

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’276
बहरे-कामिल मुसम्मन सालिम
मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
11 212 11 212 11 212 11 212
वो जो घर था, तुम से ही था वो घर, तुम्हें याद हो कि न याद हो
तुम्हें ढूंढती रही हर नज़र, तुम्हें याद हो कि न याद हो
जो बढीं कभी ये उदासियाँ, तुम्हें देखते ही पलट गयीं
थे तुम्हीं से खुश मेरे बामो-दर, तुम्हें याद हो कि न याद हो
जो क़बा थी दिल पे निखर गयी, जो रिदा थी तन पे सँवर गयी
थे तुम्हीं खुमारे-दिलो-नज़र, तुम्हें याद हो कि न याद हो
तुम्हीं ज़िन्दगी के चढ़ाव थे तुम्हीं ज़िन्दगी के पड़ाव थे
था तुम्हारा जल्वा ही कारगर, तुम्हें याद हो कि न याद हो
मुझे लग्ज़िशों पे गुमान था, मेरी ज़द में सारा जहान था
मेरे साथ थे तुम्हीं हमसफ़र, तुम्हें याद हो कि न याद हो
न फ़िज़ाओं में है चमक दमक न हवाओं में कोई ताज़गी
था वक़ार तुमसे ही जल्वागर, तुम्हें याद हो कि न याद हो
वही ज़हर में सना आसमां, वही इस ज़मीन की मुश्किलें
तुम्हीं इक थे राहते-दिल मगर, तुम्हें याद हो कि न याद हो
तुम्हें मैं अगर न मना सका कि जो रूठने पे ही आए तुम
मुझे याद अपना है खौफ़-डर, तुम्हें याद हो कि न याद हो
तुम्हीं दिल के चैन क़रार थे, कि तुम्हीं तो जाने-बहार थे
अभी कल की बात है सब मगर, तुम्हें याद हो कि न याद हो
कभी झेंप जाते थे उस घड़ी, जो लगा के चेहरे पे टकटकी
तुम्हें देखता था मैं आँख भर, तुम्हें याद हो कि न याद हो
मेरी इल्तिज़ा वो गुजारिशें, वो 'कँवल' की अदना सी ख्वाहिशें
चले मस्तियों की डगर डगर, तुम्हें याद हो कि न याद हो