#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’279
वह जो लगता था पयम्बर इक दिन
अपना ही भूल गया घर इक दिन
कांच का घर उसे याद आयेगा
खूब पछतायेगा पत्थर इक दिन
ढंड पंहुचायेगा, राहत देगा
रेत का गर्म ये बिस्तर इक दिन
लाज रख लेगी तेरे जज़्बों की
मेरे अहसास की चादर इक दिन
आतिशे-वक़्त में तपते तपते
हीरे बन जायेंगे कंकर इक दिन
लुत्फ़े-शोहरत2 मुझे दे जायेगा
तपते लफ़जों3 का समुंदर इक दिन
पाप जल जायेगा दुनिया का 'कँवल’
आंख जब खोलेगा शंकर इक दिन