#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’275
लिबासे- जि़ंदादिली1 तार तार था कितना गि़लाफ़े-ज़ीस्त2 में वह बेक़रार था कितना
हसीन दर्द का सोलह सिंगार था कितना मुझे हयात3 की रानी से प्यार था कितना
फ़सीले-शब4 से इरादों के पांव रूक न सके तुलू-ए-सुबह 5 का मुझको खुमार था कितना
मै सुन रहा था दरे-दिल पे दस्तकें उसकी
विरह का वातावरण ख़ुशगवार था कितना
मेरी तलाश में उसकी निगाहे-बेकस 6 थी
वो पंख दे मुझे अश्कबार था कितना
न रास आ सकी जिस्मों की दोपहर उसको
लबों की धूप में वो बेक़रार था कितना
सफ़ीना7 सांसों का था मौत के भंवर में 'कँवल’
किसी का फिर भी मुझे इंत़जार था कितना