#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’271
फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ैलुन
लफ़्ज़ बरते गए सलीक़े से
मा'नी समझे गए हैं अच्छे से
ये ज़माना हुआ मुख़ालिफ़ जब
साथ रहते कहाँ ज़माने से
तीरगी खो गयी जुदाई की
वस्ल की धूप आई ज़ीने से
मुझको बेचैन करते हैं अब भी
हौसले डूबते सफ़ीने से
मुझको दुनिया समझ में क्या आई
भूल बैठे इसे क़रीने से
ज़िन्दगी की उदास शहजादी
भीगा आँचल है, होंठ गीले से
बेसबब हैं 'कँवल' के लब सूखे
ख़ाली आँखों के दीप बुझते से