#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’274
मफ़ऊलु फ़ाइलातु मफ़ाईलु फ़ाइलुन
लमहाते- शाख़े-वक़्त ने क़ादिर बना दिया
रिश्तों के तजरुबात ने माहिर बना दिया
मंज़र की चाहतों ने मुसव्विर बना दिया
तहरीरे- ख़ुशक़बा ने मुहर्रिर बना दिया
कोई हो ज़ह्नो -दिल ने कहाँ सोचा कुछ ग़लत
हालाते-मुश्किलात ने ताहिर बना दिया
यादों में उसकी कहने लगा हूँ हसीं ग़ज़ल
जज़्बाते-ख़ुशमिज़ाज ने शाइर बना दिया
सोचा था घर बना के रहूँगा सुकून से
घर की ज़रूरतों ने मुसाफ़िर बना दिया
लमहों में लुट गया मेरे ईमान का जहाँ
उनकी निगाहे-नाज़ ने काफ़िर बना दिया
मैं क्या उसे तो दिल से बहुत चाहते थे सब
सबने घने दरख़्त को नाज़िर बना दिया
आँखों के हुस्न, लब की कशिश, बू-ए-ज़ुल्फ़ ने
हज़रत ‘कँवल' के यार को साहिर बना दिया
लमहाते- शाख़े-वक़्त – समय की शाख़ के क्षण / समय
क़ादिर -- शक्तिशाली और समर्थ ,भाग्यवान,
मंज़र - दृश्य
मुसव्विर - चित्रकार
तहरीरे- ख़ुशक़बा - सुन्दर लिखावट
मुहर्रिर - लिपिक
ताहिर – शुद्ध,स्वच्छ, पवित्र
जज़्बाते-ख़ुशमिज़ाज – प्रसन्नचित भावना
मुसव्विरी – चित्रकारी
लताफ़त - कोमलता,लालित्य,नफ़ासत
मनाज़िर - दृश्य
नाज़िर – प्रबंधक,निरीक्षक
लब की कशिश – होंठों की आकर्षण शक्ति
बू-ए-ज़ुल्फ़ – अलकों/बालों का सुगंध
साहिर -जादूगर