#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’264
रिश्ते रिसते रह जाते हैं
कल तक कल को दुहराते हैं
थान हार जाते हैं लेकिन
गज़ भर नहीं लुटा पाते हैं
चिथडों में यौवन की उलझन
मॉडल कैसे इतराते हैं
चीख़ हवेली से उठती है
ख़्वाब ख़्वाब को दफ़नाते हैं
धूप का ग़ुस्सा कम होते ही
शाम को चेहरे खिल जाते हैं
उन्हें मुहब्बत क्यों मिलती है
जो न मुहब्बत कर पाते हैं
आँखों में पानी रखने को
आँखों आँखों शरमाते हैं
ग़ैर के दिल में उतरने वाले
दिल में कहाँ उतर पाते हैं
ख़ुद से ज़्यादा जग के जो हों
सब को ‘कँवल’ बहुत भाते हैं