#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’262
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलात
रात का क़िस्सा कहानी आधी रात
गुलरुखों की शादमानी आधी रात
हाले-दिल मैं बेसबब सुनता रहा
मौसमों की तर्जुमानी आधी रात
मुफ़लिसों पर पड़ गई भारी बहुत
जनवरी में राजधानी आधी रात
मुल्क की रुसवाई पर आमादा थे
लोग कुछ- कुछ ख़ानदानी आधी रात
बारिशों ने डालना चाहा ख़लल
भीड़ की थी क़द्रदानी आधी रात
रोमियो स्क्वाड था करता रहा
मनचलों पर मेहरबानी आधी रात
पूजा-पंडालों में अतिशय भक्त थे
ख़ुश 'कँवल' थीं माँ भवानी आधी रात