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रोज़ डूबे हुये सूरज को उगा देती है

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’268
रोज़ डूबे हुये सूरज को उगा देती है
रात किस किस को अंघेरे मे सदा देती है
वक़्त की घूप मुझे कैसी सज़ा देती है
आग हर ख़्वाब के जंगल में लगा देती है
आबशारों1 से उभरती हुई शादाब2 सदा 3 दिल मे ग़ालीचा-ए-ख़्वाहिश4 को बिछा देती है
तल्ख़5 सांसों के सफ़र की ही सज़ा है काफ़ी
जि़ंदगी क्यों मुझे अहसासे-ख़ला6 देती है
यूं तो जंगल में सिककती है हवा सदियों से
खुश्क शाख़ों को मगर रंग हरा देती है
कड़वे हालात के गिर्दाब7 से हस्ती मेरी
लज्‍़ज़तें-साहिले-तिफ़्ली8 को सदा9 देती है
तुझसे बिछुडे हुये अरसा हुआ पर जाने-कंवल
तेरी सौग़ात मुझे अब भी रूला देती है