#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’258
रंगरलियाँ वो मनाने को तहख़ाने में मिले
बेटे के साथ बाप भी मयख़ाने में मिले
अब धूप नर्म हो गई गुस्सा उतर गया
कुछ लोग हुस्ने-शाम को समझाने में मिले
मेरी ज़रूरतों ने लिया छीन आन बान
मेरे ज़मीरो-रुत्बा सियह्ख़ाने में मिले
दस्तक दिया था वक़्त ने कहते ख़ुशआमदीद
तुम तो अना की ज़िद को ही समझाने में मिले
यूँ ख़ुद में खो गये कि पता ही नहीं चला
वीराने में मिले न सनमख़ाने में मिले
गावों की मुख़लिसी हुई गुम शहर में ‘कँवल’
कुछ लोग ये लिखवाते हुए थाने में मिले
सृजन : 1 मार्च 2014 (21)