#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’260
रहबरे - क़ौम, रहनुमा तुम हो
ना उमीदों का आसरा तुम हो
मैं सियासत की बेईमान गली
और रिश्वत की अप्सरा तुम हो
गालियों में तलाशता हूँ शहद
राजनीति का ज़ायक़ा तुम हो
चौक पर की है, बहस चौका में
सेक्युलर मैं हूँ, भाजपा तुम हो
फ़स्ले - बेरोजगारी हैं दोनों
मैं हूँ स्कूल, शिक्षिका तुम हो
मुझको क्या इससे फ़र्क़ पड़ने का
मैंने माना कि दूसरा तुम हो
क़ुरबतें सीढि़यों से उतरेंगी
लोग समझेंगे फ़ासला तुम हो
आवरण मैं उदासियों का 'कंवल'