Back to List

मै शहर मे पत्थर के हूं इक पैकरे-जज़्बात

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'248
मै शहर मे पत्थर के हूं इक पैकरे-जज़्बात
ऐ काश! मिले कोई जो समझे मेरे हालात
रूत मस्त है, भीगी है हवा, चांदनी है रात
आ जाओ तुम ऐसे में लिये प्यार की सौग़ात
सहमी हुई सांसों की थकन, मौत की घातें
किस मोड़ पे ले आई है अरमानों की बारात
भटके है बहुत अहले-खि़रद1 गलियों में तेरी
इस तरह न हंस, दे के जुनूं2 की हमें सौग़ात
घबराओ न ऐ गर्दिशे-अययाम3 के मारो
अब गम के फ़साने में हैं दो चार ही स फ़्हात4
खोया हुआ हर शख़्स है दुख-दर्द में अपने
आ जाये कोई काश लिये खुशियों की बारात
ये तल्ख़ी-ए-हालात सताती है 'कंवल’ जब
याद आते है माज़ी5 के महकते हुये लम्हात6