#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'243
मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन फ़ऊलुन
मेरे सर की क़सम खाने लगा है
वो कह कर झूठ फुसलाने लगा है
बड़ी मुश्किल घड़ी है सामने अब
मैं हूँ आसां वो बतलाने लगा है
अजब मौसम है शहरो-गाँव में अब
किसी का डर हमें खाने लगा है
कहाँ का घर ये कैसा घर जहाँ पर
दरख़्ते - अम्न मुरझाने लगा है
'अबाइड विद मी' धुन बदलेगा भारत
'बिटिंग रिट्रीट' मुस्काने लगा है
सियासत किस तरफ़ बदलेगी करवट
हर इक अख़बार में आने लगा है
निज़ामे - मुस्तफ़ा की क़ब्र पर ध्वज
'कँवल' भगवा का लहराने लगा है