#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'242
मेरे मंसूब होने के क़िस्से
तेरे कमयाब होने के चर्चे
बेख़बर तीरगी के दर्द से है
शम्म-ए-महफ़िल जलाया है जिसने
एक कोहराम सा उठा घर में
उसकी दस्तक है मेरे दरवाज़े
पास था दिल जो दूर था कोई
कोई पास आया,दिल गया उड़ के
रंग और नूर की नुमाईश है
शाहराहों पे मेले ही मेले
जग तो हँसता है बेमुरव्वत सा
तेरी फ़ुरक़त में हम हँसे न हँसे
चहचहा उट्ठा है ये घर मेरा
मेरी बेटी के साथ हैं कमरे
तेरी यादों की शोख़ बस्ती में
हम लुटे रोज़, रोज़ रोज़ लुटे
बेनियाज़ी से है ‘कँवल’ बरह्म
सामने हूँ, मेरी तरफ़ देखे
सृजन : 24 अक्टूबर,2015