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मेरी पलकों पे तेरे ग़म खज़ाने निकले

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'239
मेरी पलकों पे तेरे ग़म ख़ज़ाने निकले
और होंटों पे तबस्सुम के तराने निकले
फिर मेरा क़िस्सा मुझे आप सुनाने निकले
दिल दुखाने को बहुत खूब बहाने निकले
तुम से बिछड़ूँ तो मैं जिंदा रहूँ, कब सोचा था
तुम चले आये तो मौसम भी सुहाने निकले
फ़तह कर के भी तो शर्मिंदा रहे तुम ख़ुद से
क्यों नहीं शहर में फिर जश्न मनाने निकले
रहनुमाई का दिखाते कोई दिलकश मंज़र
तुम तो बस बात फ़क़त बात बनाने निकले
आप भी आग लगाने का हुनर रखते हैं
बन संवर शौक़ से बारिश में नहाने निकले
मुल्क नाजां है जवानों के इसी जज़्बे पर
जान पे खेल के आफ़त से बचाने निकले
छेड़ना ठीक नहीं नदियों, पहाड़ों को ‘कँवल’
ज़लज़ले क़हर-ए-ख़ुदा बन के बताने निकले
सृजन 27 जून 2013
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