#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'230
डॉ कृष्ण कुमार 'नाज़' की नज्र
मुझसे मिल के वो क्यों इतना गदगद हुआक्या मैं उसकी मसर्रत की सरहद हुआ
फ़ायदा झुक के मिलने से बेहद हुआसबके क़द से बड़ा मेरा ही क़द हुआमसअले नौजवानों के गुमसुम रहे हिंदू मुस्लिम पे हर मुख विशारद हुआ ताज तेजोमहालय न कहलाए क्यों
उसके हर कक्ष से बुत बरामद हुआ
संस्कृति धर्म संग्राम प्रारंभ है
बंद तुष्टीकरण हो ये मक़सद हुआ
हमने पैग़ाम अम्नो-अमां का दिया
फिर भी सरहद पे आतंक बेहद हुआ
माँ से बरकत, हिफाज़त, मुहब्बत 'कँवल'