#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'229
मफ़ऊलु फ़ाइलातु मफ़ाईलु फ़ाइलुन
मुझको निहारते रहे सामान की तरह
कुछ लोग घर पे आए थे मेहमान की तरह
सहमी हुई वो जिंस बनी थी दुकान में
सब देखते रहे उसे गुलदान की तरह
रस्मो-रिवाज से कभी ग़ाफिल कहाँ हुआ
उसमें कशिश थी मीर के दीवान की तरह
इक दायरे में क़ैद मुझे करने जब लगे
मैं क़हर बन गया किसी तूफ़ान की तरह
क़ुर्बत की होड़ मच गई महफ़िल में हर तरफ़
जोड़े में सुर्ख़ आया वो ऐलान की तरह
जितनी भी ने'मतें हैं सभी दस्तयाब हैं
सच है न माह कोई है रमज़ान की तरह
रिश्तों की अज़मतों की बड़ी क़द्र थी 'कँवल'
दुख हो कि सुख, वो साथ रहा जान की तरह