#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'227
मुक़द्दर1 का सूरज घटाओं में था मेरा हाले-ख़स्ता2 ख़लाओं3 में था
सभी हँस रहे थे, मुझे देखकर
बिखरता हुआ मैं हवाओं में था
शिकन की तहें मेरे माथे पे थीं
कि दरपन भी ना आशनाओं4 में था
मै सुक़रात था चीख़ता किस तरह
सकूते-अजब5 भी दिशाओं में था
मेरे होंठों पर थी लबों की तपन
मुझे चैन जु़ल्फ़ों की छाँओं में था
कोई शहर में था परेशां बहुत
कोई शख्स बेचैन गाँओं में था
शबो-रोज़6 बिखरी हुई ज़िन्दगी
'कंवल’ इससे बेहतर गुफाओं में था
1 भाग्य, 2. दुखी हृदय/ बुरा हाल, 3. शून्य /अंतरिक्ष 4. अपरिचित /अनभिज्ञ, 5. आश्चर्य जनक चुप्पी, 6. रात दिन / हर पल