#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'247
मैं अपने होंठों की ताज़गी को तुम्हारे होंठों के नाम लिख दूँ
हिना से रोशन हथेलियों पर नज़र के दिलकश पयाम लिख दूँ
अगर इजाज़त हो जाने-मन तो किताबे-दिल के हर इक वरक़ पर
मैं सुबहे-काशी की रौशनी में अवध की मस्तानी शाम लिख दूँ
बदन पे सावन की है इबारत, नज़र में दोनों की एक चाहत
मेरे लबों को जो हो इजाज़त, वफ़ा का पहला सलाम लिख दूँ
जो दिलनशीं है सितम पे माइल उसे हर इक पल दुआएँ दूँ मैं
सुलगते सूरज से दूर रखकर अमन सुकूं का क़याम लिख दूँ
मसर्रतों पे ग्रहण प्रदूषण अवामी ख़ुशियाँ बिलख रही हैं
तुम्हीं बताओ ऐ मेरे रहबर कहाँ से बेहतर निज़ाम लिख दूँ
डिलीट कर दूँगा उसके ग़म को मैं दिल के अब लैप टॉप से ही
ख़ुशी के जितने मिले हैं 'डाटा' उन्हें मैं दिलबर के नाम लिख दूँ
मुक़द्दमा जो चला बहुत दिन लो आ गया उसका फ़ैसला भी
‘कँवल’ मैं चाहूँ गले लगाकर अदू के दिल में भी राम लिख दूँ
हिना - मेहंदी इबारत - लिखावट
सृजन 5 नवम्बर,2019 अदबी महाज़,कटक ,अक्टूबर से दिसम्बर 2020 अंक के पृष्ठ 44 पर प्रकाशित, 2020 की नुमाइंदा ग़ज़लें, एनीबुक प्रकाशन के पृष्ठ 248 पर प्रकाशित
30 ग़ज़लगो : 300 ग़ज़लें , एनीबुक प्रकाशन के पृष्ठ 127 पर प्रकाशित
14 अगस्त 2021 को दूरदर्शन केंद्र पटना से रात्रि 8 बजे प्रसारित