#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'226
मये-गुलरंग1 का क़सूर नहीं
तेरे दिल में ही कुछ सरूर नहीं
लब सुलगते हें जिस्म जलता है
यूं ही बाहों में रहिये दूर नहीं
जिक्रे-इन्सां पे चौंकने वालो
मेरे पहलू में कोई हूर नहीं
चौक उठता हूं चीख़ पर अपनी
मुझको जीने का कुछ शउर नहीं
गूंज पाई न लज़्ज़तों की सदा
ग़म का सन्नाटा बेक़सूर नहीं
मेरी जानिब भी इक निगाहे-करम2
कुछ कमी तो तेरे हज़ूर नहीं
तेरी काफि़र अदा भी कातिल है
सर्द मौसम का ही क़सूर नहीं
बाखुदा आज भी हैं आप ‘कंवल’
आंख से दूर दिल से दूर नहीं