#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'222
उस्ताद -ए– मोहतरम जन्नतनशीन हफ़ीज़ बनारसी मरहूम की नज्र
बेहुनर को सिखाया हुनर
बेअसर को किया पुरअसर
है नवाज़िश,करम आपका
दाद देते हैं अहले-नज़र
बारिशों के मज़े के असर
गल रहे गीली मिटटी के घर
धूप निकली नहीं पूरे दिन
चाँदनी पर थी उसकी नज़र
उन उड़ानों का अब ज़िक्र क्या
हौसला था, मैं जब था निडर
ऐसे लिक्खा मुझे आपने
ख़ुश हुआ पढ़ के सारा नगर
एक अफ़वाह उडती रही
मीडिया में रही इक ख़बर
माँ की बांहों में खोई रही
बेटी ससुराल से आई घर
मैं ‘कँवल’ उस पे मरता रहा
मुझ पे थी वह फ़िदा उम्र भर
सृजन : 14 फ़रवरी 2014 (वैलेंटाइन डे)
प्रसारण : आकाशवाणी,पटना 6 मार्च 2014