#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'217
मफ़ऊलु फ़ाइलातु मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
221 21 21 1 221 212
बारिश में भीगते हुए पास आया चल दिया
चाहत का पैरहन मुझे पहनाया चल दिया वस्त्र
बादल की मस्तियाँ जो घुलीं ज़ुल्फ़े- यार में
गेसू झटक के चेहरे पे शरमाया चल दिया
उसमें था अंश आग, गगन, भूमि, पानी का
सब कुछ किया हवाले बहुत भाया चल दिया
साहिल पे धूप सेंकती कुछ मछलियाँ मिलीं
सूरज ने सबको राज़ ये बतलाया चल दिया
उरियां बदन में परियों की दावत थी रेत पर नग्न
दरिया ने उनको उंगली से बुलवाया चल दिया
वो गुलशने - ख़याल में था मस्त पर 'कँवल'
दिल मौसमे- विसाल पे जब आया, चल दिया