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बेटी पर सख्ती, बेटों को मस्ती के त्यौहार मिले

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'220
बेटी पर सख्ती, बेटे को मस्ती के अधिकार मिले
नगरों, कस्बों और गाँवों को सीख में ये उपहार मिले
बालिग़ नाबालिग़ सब वहशी, तल्बा ज़ुल्म के मकतब के
औरत की अस्मत के लुटेरे बन के सरे-बाज़ार मिले
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, बेटी बसाओ के नारे
झूठ फ़रेब के गाँवों में फुसलाने के किरदार मिले
फ़ुर्सत के लमहात मिले तो रूठ गया जादू तन का
इक बिस्तर पर दो जिस्मों के बीच में खर-पतवार मिले
पटरानी बन कर पीड़ा ने घर घर पर अधिकार किया
सुख आराम के दाई नौकर बाहर के हक़दार मिले
देख नहीं सकते जिसको कोहराम मचाया है उसने
उसके आगे फ़ेल मिसाइल, एटम बम, हथियार मिले
मज़दूरों की रोटी-रोज़ी ग़ायब, भात मुहाल हुआ
पैदल,ट्रक या रेल के डिब्बों में बेबस घरबार मिले
मौत का मीटर,खौफ़ की दहशत क़ाबू में आए न ‘कँवल’
डॉक्टर हों या नर्स पुलिस, गुमसुम जग के व्यापार मिले
सृजन : 14 मई, 2020