#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'213
बल खाती मछलियां हैं, सफ़र चांदनी का है
मस्ती है चांद रात है, क़िस्सा नदी का है
दिल में ख़लिश है, लब पे हंसी,सावन आंख में
जो भी नसीब मुझको हुआ सब उसी का है
तुम कह रहे हो किसकी कहानी बताओ भी
किस्सा ये हू- ब - हू मेरी दीवानगी का है
वो बेरुख़ी की धूप है, मैं बेबसी का गांव
मुंसिफ़ का उसको, मुझको मज़ा कचहरी का है
तुम हो बज़िद जो साथ निभाने पे कर लो ग़ौर
दिल का मुआमला है नहीं दिल्लगी का है
फूलों की पंखडि़यां भी हैं, तितली के पर भी हैं
यादों का है सफ़र तो वरक़ डायरी का है
परवरदिगार जानता है उससे छूट कर
अब कुछ अजीब हाल मेरी ज़िन्दगी का है
अंदाजे़ - आशनाई से वाकिफ़ नहीं हूं मैं