#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'206
फूल को ख़ुशबू , सितारों को चमन हासिल हो
सुबह को शाम से मिलने की लगन हासिल हो
अनसुने किस्सों को बेखौ़फ़ कथन हासिल हो
ग़म के अहसास को ग़ज़लों का सुख़न हासिल हो
आपसे मिल के मुझे ख़ुशियों का घर-बार मिले
आपके घर को भी लज़्ज़त का सहन हासिल हो
मेरी फ़ुरकत में उदास आप कभी हों कि न हों
मेरी आंखों को जुदाई में चुभन हासिल हो
मुझको हासिल हो तेरी ख़ुशबू, तेरे साथ सफ़र
और तुझको मेरी चाहत का चमन हासिल हो
तेरे दीदार की ठंडक मुझे गर्मी में मिले
सर्दियों में तेरे गालों की तपन हासिल हो
गुनगुनाता रहे रिमझिम की फुहारों में 'कँवल'
बारिशों में तेरा भीगा सा बदन हासिल हो
प्रकाशन : अब्ज़द 8 -10/2011
सुखनवर 11-12 /2010