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पाँच जी की ही चल रही है हवा-

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'200
फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़ इ लुन
पाँच जी की ही चल रही है हवा
तेज़ रौ धुन में ढल रही है हवा
बदला बदला है नक्शा गुलशन का
खारो- ख़स को मसल रही है हवा
मदरसों का निज़ाम और चलन
बाद मुद्दत बदल रही है हवा
सोचती थी बुझा के दम लेगी
दीप जल उट्ठे जल रही है हवा
धूप का लुत्फ़ छत पे लेते हुए
रफ़्ता रफ़्ता टहल रही है हवा
उसके बाज़ू में शोला है कोई
बर्फ़ पहने मचल रही है हवा
लग न जाए बदन में आग 'कँवल'
दिल का मौसम बदल रही है हवा
रमेश ‘कँवल’
2 अक्टूबर,2022