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पहुँच इक मुश्ते-खाकी1 की सितारों के जहां तक है

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'199
पहुँच इक मुश्ते-खाकी1 की सितारों के जहां तक है
जुनूने-शौक2 की शोहरत3 ज़मीं से आस्मां तक है
बना डाला मुहब्बत ने उन्हें रश्के-महो-अख़्तर
जहां हैरां है, इक ज़र्रे4 का शोहरा5 कहकशां 6 तक है
भटकती फिर रही है बाग में बेआबरू होकर
फ़साना7 बर्क8 का शायद मेरे ही आशियां9 तक है
फि़राक़े-यार में रह रह के यूं दिल पे गुजरता है
मज़ा जीने का दुनिया में बहारे-दोस्तां10 तक है
फ़क़त उड़ती हुई खुशबू थी वस्ले- यार की खुशियां
मगर इक शख़्स के ग़म की रिसाई जिस्मों-जां तक है
कोई गुज़रा है यूं खुशबू लुटाता सहने-गुलशन11 से
कि खोया सा तसव्वुर12 में कंवल दौरे-खिज़ां तक है