#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'194
नुक़्रई1 उजाले पर सुरमई अंधेरा है यानी मेरी कि़स्मत को गर्दिशों ने घेरा है
वक़्त ने जुदाई के ज़ख़्म भर दिये लेकिन
ज़ख़्म की कहानी भी वक़्त का ही फेरा है।
टूटते बिखरते इन हौसलों को समझाओ उलझनों की शाख़ों पर लज़्ज़तों का डेरा है
आने वाला सन्नाटा मस्तियाँ उड़ा देगा
नागिनो! संभल जाओ सामने सपेरा है
मछलियों की बस्ती में कितना प्यारा मौसम है
जाल भी नहीं कोई और न ही मछेरा है
आप ही सी इक मूरत फिर है दिल के मंदिर में
आप की अदाओं का दिल में फिर बसेरा है .
क्यों 'कँवल’ को समझे हो रात की अलामत2 तुम
वो तो एक सूरज है, चंपई सवेरा है।