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न कोई लाल-ओ-गौहर देखते हैं

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'184
न कोई लाल-ओ-गौहर देखते हैं
वफ़ा, इख़लास दिलबर देखते हैं
उसे इक बात कह कर देखते हैं
ख़फ़ा होने का मंज़र देखते हैं
हसीं हैं ज़ुल्फ़-ओ-लब,रूख्सार,आँखें
इन्हें आँखों में भर कर देखते हैं
मैं उसको देखता हूँ हसरतों से
मुझे वो बन संवर कर देखते हैं
मेरी आँखों में बादल झूमते हैं
अब आँखें तर ब तर कर देखते हैं
जिन्हें हमने दिया राहत का गुलशन
हम उन हाथों में पत्थर देखते हैं
हजूमे-तिश्नगी पल भर का मेहमां
क़रीब अपने समंदर देखते हैं
प्रदूषित नर्मदा,गंगो-जमन हैं
कोई तजवीज़ बेहतर देखते हैं
नहीं राहत रसां यादों का बिस्तर
चलो करवट बदल कर देखते हैं
उन्हें हम देखते हैं मुस्कुरा कर
हमें वो मुस्कुरा कर देखते हैं
नहीं है बेसबब उनकी मुहब्बत
‘कँवल’ उनको परख कर देखते हैं
सृजन : 27 फ़रवरी 2014
महाशिवरात्रि
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