#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'187
नज़र से आरती तेरी उतारूंचले आओ तुझे पलभर निहारूंतुझे पाकर ख़ुशी है बेतहाशा मैं तेरे रूबरू तुझको पुकारूंतुम्हें पाकर तमन्ना सर उठाये तुम्हारे बिन न अब जीवन गुज़ारूं
तुम्हारे साथ बीती है घड़ी जो भला उस पल को मैं कैसे बिसारूंसड़क पर है प्रदूषण शोरगुल कामैं कानों से इन्हें कब तक दुलारुं ज़बरदस्ती की ज़िद पर है जो मज़हबउसे मैं अम्न का वैरी पुकारूं'कॅंवल' हो फ़ेल साज़िश दुश्मनों कीसनातन धर्म को ऐसे सवारूंरमेश कॅंवल