#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'189
नशे में चूर होना चाहती है
वफ़ा मख़्मूर होना चाहती है
ठहरती है कहाँ बेग़म ख़ुशी की
ये पल में दूर होना चाहती है
मसर्रत रूबरू है ज़िन्दगी के
ये भी मसरूर होना चाहती है
मज़े में नस्ल -ए- नौ है झूठ कह कर
ये कब मंसूर होना चाहती है
न है परहेज़ कुछ रुसवाइयों से
ये रुत मशहूर होना चाहती है
ये है तहज़ीब भी,इसको संभालो
ये उर्दू दूर होना चाहती है
‘कँवल’ मुझको भी अब फ़ुर्सत कहाँ है
वो भी माज़ूर होना चाहती है
सृजन : 25 मार्च 2014
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