#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'182
ध्वंस का वंध्याकरण अब कीजिये
शांति को कुछ आवरण तो दीजिये
ज़हर हरदम घोलिये मत देश में
दिल मिलें, वातावरण वह दीजिये
रोज़ होती है क़लम सरहद पे क्यों
आदमी की आदमीयत बोलिये
किस लिये दहशत की साये में हैं सब
आजकल कश्मीर में ये सोचिये
झूठ में है सच महारत आपको
सत्य का इक आचरण भी कीजिये
दर्द की शिद्दत हो या ज़्यादा ख़ुशी
प्रेम को भी व्याकरण इक दीजिये
हो गये रूखसत 'कँवल' आनंद क्षण
दर्द का पाणीग्रहण अब कीजिए
सृजन 25 फरवरी 2018
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